Chapter 02


 





पुरातत्व (Archaeology)

    Archaeology यूनानी भाषा के Archaios (पुरातन) तथा logos (ज्ञान) से मिलकर बना है। प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता स्टुअर्ट पिग्गट ने इसे 'इतिहास की एक शाखा' कहा है। वस्तुतः साहित्यिक स्रोतों की कुछ सीमायें भी जैसे प्रामाणिकता की समस्या, प्रतिलिपि बनाने में दोष एवं ऐतिहासिक ग्रन्थों का अभाव। साहित्यिक स्रोतों से भारतीय इतिहास की सम्पूर्ण जानकारी उजागर नहीं हो पाती। इसीलिए कहा जाता है कि जहाँ से साहित्य मौन हो जाता है वहाँ से पुरातत्व बोलता है। वस्तुतः कभी-कभी पुरातात्विक स्रोत ही महान् शासकों के विषय में जानकारी के एकमात्र साधन होते हैं। उदाहरणार्थ समुद्रगुप्त के विषय में हम केवल उसके अभिलेख तथा सिक्कों से ही जानकारी प्राप्त करते हैं। दूसरे हमें सैन्धव, ताम्रपाषाण, महापाषाण आदि युगों का पुरातत्व तो मिलता है परन्तु साहित्यिक स्रोत नहीं। ऐसे ही वैदिक युग में साहित्यिक स्रोत प्रचुर मात्रा में मिलते हैं लेकिन पुरातात्विक स्रोतों का मोटे तौर पर अभाव ही है। परन्तु, 600-300 ई.पू. की कालावधि से दोनों स्रोत मिलते हैं और अब से हम साहित्यिक एवं पुरातात्विक दोनों स्रोतों का तुलनात्मक अध्ययन कर सकते हैं। ऐसे ही शिथियन (शक) एवं पार्थियन (पहलव) शासकों के इतिहास के मुख्य स्त्रोत पुरातत्व (सिक्के एवं अभिलेख) ही हैं।

भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग

भारतीय पुरात्तत्त्व के 100 वर्षों के इतिहास को प्रो. हंसमुख धीरजलाल सांकलिया (1908-1989) महोदय द्वारा तीन कालों में विभाजित किया गया था-

ü  प्रथम काल (1861-1902),

ü  द्वितीय काल (1902-1944)

ü  तृतीय काल (1944-1960)

प्रथम काल या कनिंघम युग (1861-1902 ई.)

§  1861 में कनिंघम ने लार्ड केनिंग को भारत के पुरातात्त्विक धरोहर के सुव्यवस्थित अध्ययन के लिए एक स्मरणपत्र (Memorandum) दिया। कैनिंग ने कनिंघम को ही इस कार्य को सम्पन्न करने का दायित्व सौंपा। अतः भारतीय पुरातत्व विभाग की परिकल्पना कनिंघम ने ही तैयार की थी। उन्हें ही इस विभाग का प्रथम प्रमुख बनाया गया।

§  1861 में कनिंघम को पुरातात्विक सर्वेयर नियुक्त किया गया। परन्तु, 1866 में लार्ड लारेन्स ने इस पुरातत्व विभाग को समाप्त कर दिया।

§  1871 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण नाम से एक 'स्वतंत्र विभाग' गठित किया गया। कनिंघम 2000 के मासिक वेतन पर इसके प्रथम महानिदेशक बने। वह भारत के प्रथम पेशेवर पुरातत्वविद् (professional archaeologist) थे। फरवरी, 1871 में कनिंघम ने कार्यभार संभाला। भारत आते ही उन्होंने मुगल साम्राज्य की दो महत्वपूर्ण राजधानियों (दिल्ली एवं आगरा) का सर्वेक्षण किया। 1876 में कनिंघम ने तक्षशिला के टीले से सिकन्दर के पहले के भारतीय सिक्कों की प्राप्ति की थी।

§  कनिंघम के सुझाव पर जान फेथफुल फ्लीट को 1873 में शासकीय पुरालिपिवेत्ता नियुक्त किया था। कनिंघम के सुझाव पर लिटन ने 1878 में पुरानिधि निखात अधिनियम पारित किया। 1885 में कनिंघम सेवानिवृत्त हो गये परन्तु जाते-जाते पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक पद को समाप्त करने की संस्तुति कर गये।

§  लॉर्ड लिटन ने प्राचीन स्मारकों की देख-रेख के लिए एक क्यूरेटर की नियुक्ति का प्रस्ताव रखा जिसे भारत सचिव द्वारा अस्वीकार कर दिया गया था।

§  लार्ड रिपन के काल में क्यूरेटर (प्राचीन इमारतों का संग्रहाध्यक्ष) का पद आया। 1880 में इस पद पर पहली नियुक्ति एच.एच. कोल की हुई।

§  कोल द्वारा साँची स्तूप का परिरक्षण किया गया। कोल का मत था कि "इस देश की प्राचीन कलाकृतियों की लूट होने देना मुझे आत्मघाती और असमर्थनीय नीति लगती है।" वे मानते थे कि संग्रहालयों में मूर्तियों की प्लास्टर प्रतिकृतियाँ रखी जानी चाहिए जबकि असली कृतियाँ खोज की जगह पर ही रखी जानी चाहिए। दुर्भाग्य से कोल अधिकारियों को अमरावती पर इस बात के लिए राजी नहीं कर पाए। लेकिन खोज की जगह पर ही संरक्षण की बात को साँची के लिए मान लिया गया।

§  कनिंघम के पश्चात् 1886 में वास्तुकलाविद् जेम्स बर्जेस महानिदेशक बनें। इससे पूर्व 1872 में ही जेम्स बर्जेस ने Indian Antiquary नामक पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ कर दिया था जिसमें प्राचीन अभिलेख प्रकाशित होते थे। 1888 से बर्जेस ने Epigraphia Indica का प्रकाशन शुरु करवाया।

§  पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग की पूर्व अनुमति लिए बिना उत्खनन करना अवैध घोषित कर दिया गया। पुरावशेषों के आदान-प्रदान पर भी रोक लगा दी गयी। जेम्स बर्जेस के काल में उत्खनित एकमात्र स्थल मथुरा का कंकाली टीला था।

§  बर्जेस की सलाह पर संस्कृत, पालि और द्रविड़ माषाओं के विशेषज्ञ ई. हुल्श को पुरालिपिवेत्ता नियुक्त किया गया। इस दौरान हुल्श ही एकमात्र विद्वान थे जो प्राचीन तमिल अभिलेखों की लिपि को पढ़ने में समर्थ थे।

§  1888 के ट्रेजर-ट्रोव एक्ट के अनुसार सरकार पुरातत्विक महत्त्व की किसी भी चीज को हस्तगत कर सकती थी।

द्वितीय काल या मार्शल काल (1902-1944 ई.)

 

§  1900 ई. में एशियाटिक सोसायटी बंगाल के समक्ष बोलते हुए कर्जन ने कहा था, "उत्खनन एवं खोज करना, प्राचीन लिपियों को पढ़ना और उन्हें सुरक्षित रखना हमारा दायित्व है।” 1904 में कर्जन के समय प्राचीन स्मारक परिरक्षण अधिनियम पारित हुआ। कर्जन ने भारतीय रियासतों को भी बाध्य किया कि वे पुरातात्विक ऐतिहासिक धरोहरों को सुरक्षित रखे। उसने पुरातत्व के वस्तुओं के संग्रह हेतु कलकत्ता का विक्टोरिया मेमोरियल बनवाया तथा एक राजकीय पुस्तकालय भी बनवाया जिसे British Museum Library कहा गया।

§  इसी चरण में कुछ भारतीय राज्यों ने पुरातत्व विभाग की स्थापना की जैसे मैसूर, ट्रावनकोर, जयपुर, बड़ौवा, हैदराबाद और ग्वालियर।

§  कर्जन ने 1902 में जॉन मार्शल को पुरातत्व विभाग का प्रमुख बना दिया। प्रारम्भ में 5 वर्ष हेतु ही मार्शल को महानिदेशक का पद दिया गया था। इस पद पर नियुक्ति से पूर्व मार्शल युनान, तुर्की तथा क्रीट द्वीप में पुरातात्त्विक कार्य कर चुके थे।

§  एस.एन. रॉय ने अपनी पुस्तक 'the story of Indian archaeology में मार्शल की प्रशंसा में कहा है कि "मार्शल ने भारत को जहाँ पाया था, उसे उससे तीन हजार वर्ष पीछे छोड़ा।" मार्शल द्वारा किये गये उत्खनन की एक सीमा यह रही कि उन्होंने पुरास्थल के स्तर-विन्यास (stratification) को पूरी तरह से अनदेखा कर उत्खनन किया था।

§  28 अप्रैल, 1906 में मार्शल के प्रयासों से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को एक स्थायी विभाग बनाया गया। इस काल की एक प्रमुख उपलब्धि विभाग की वार्षिक रिपोर्ट (annual reports) का प्रकाशन था। विशिष्ट विषयों का प्रकाशन मेॉयर्स (Memoirs) में किया गया।

§  डॉ. स्टेनकोनो को भारतीय पुरालिपि विशेषज्ञ के रूप में जॉन मार्शल का सहायक नियुक्त किया गया।

o   मार्शल के निर्देशन और निरीक्षण में तक्षशिला (1913-1934) की खुदाई प्रारम्भ हुई।

o   साँची एवं सारनाथ का भी पुनः उत्खनन हुआ।

o   स्पूनर ने पाटलिपुत्र और नालन्दा विश्वविद्यालय का उत्खनन किया।

§  1923 में वायसराय लार्ड रीडिंग तथा इंचकेप ने पुरातत्त्व के बजट में 90 प्रतिशत की कटौती की संस्तुति की थी। परन्तु, मार्शल एवं तत्कालीन भारत सचिव वाईकाउण्ट पील के प्रयासों से यह कटौती कम करके 22 प्रतिशत कर दी गयी। अतः इन दोनों ने पुरातत्त्व को समाप्तप्राय स्थिति से बचा लिया।

§  A guide to Taxila एवं A guide to Sanchi जैसी पुस्तकों के लेखक जॉन मार्शल थे। 1928 में मार्शल के अवकाश ग्रहण करने के पश्चात् एच. हरग्रीब्स महानिदेशक बने। अवकाश ग्रहण के पश्चात् भी मार्शल 1931 तक 'विशेष कार्याधिकारी' तथा मार्च 1934 तक विशिष्ट कार्य के लिए 'पुनर्नियुक्त' हुए थे।

§  1931 में रायबहादुर दयाराम साहनी को महानिदेशक का पद दिया गया। इस पद पर नियुक्त होने वाले वह प्रथम भारतीय थे। इसी समय नागार्जुनाकोण्डा से प्राप्त बुद्ध के अस्थि-अवशेषों को दयाराम साहनी द्वारा श्रीलंका के पुजारियों को सौंपा गया।

§  प्राचीन स्मारक परिरक्षण अधिनियम 1904 को 1932 में संशोधित किया गया। इसके द्वारा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के बाहर के व्यक्तियों या विदेशियों को भी भारत में उत्खनन एवं अनुसन्धान की अनुमति दे दी गयी। इसी के परिणामस्वरूप 1935 में अमेरिका के बोस्टन संग्रहालय की ओर से अर्नेस्ट मैके ने चन्हूजोदड़ो का उत्खनन कराया।

§  1935 में जे.एफ. ब्लैकिस्टन महानिदेशक बने। 1937 में इस पद पर रायबहादुर के.एन. दीक्षित की नियुक्ति हुई थी। 1938 में भारतीय पुरातत्त्व विभाग के बेहतर कार्यप्रणाली के लिए 'उर' के शाही कब्रों के प्रसिद्ध उत्खननकर्ता लियोनार्ड बूले को भारत आमंत्रित किया गया। दीक्षित महोदय के ही कार्यकाल में कलकत्ता विश्वविद्यालय प्रथम विश्वविद्यालय बना जिसे स्वतंत्र रूप से उत्खनन करने की अनुमति दी गयी। इस विश्वविद्यालय द्वारा उत्खनित प्रथम स्थल बानगढ़ था।

 

तृतीय काल (1944-1960)

मार्टीमर व्हीलर (1944-1948)

§  पुरातत्त्व को एक स्वतंत्र विषय के रूप में स्थापित करने में ब्रिटिश पुरातत्वविद मार्टीमर व्हीलर का नाम सर्वाधिक उल्लेखनीय है। सेना के 'पूर्व-ब्रिगेडियर' के रूप में व्हीलर ने पुरातत्त्व की पद्धति में एक सैनिक परिशुद्धता का समावेश किया। व्हीलर के अनुसार, "पुरातत्त्वकर्ता सिर्फ वस्तुओं को नहीं खोदता अपितु मनुष्यों को भी खोदता है।"

§  1944 में 4 वर्ष के अनुबन्ध पर मार्टीमर व्हीलर ने रायबहादुर के.एन. दीक्षित के उत्तराधिकारी के रूप में महानिदेशक का पद ग्रहण किया। इनकी नियुक्ति लियोनार्ड वूले की अनुशंसा पर हुई थी। व्हीलर रोमन पुरावशेषों एवं पुरानिधियों के विशेषज्ञ थे।

§  व्हीलर ने अरिकामेडु (1945), हड़प्पा (1946), ब्रह्मगिरी (1947) की महापाषाण संस्कृति, चन्द्रवल्ली (1947) एवं मास्की का उत्खनन किया था।

§  व्हीलर के अनुसार सिंधु ने भारत को उसकी सभ्यता प्रदान की है और गंगा ने उसकी आस्था। व्हीलर ने हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो के टीलों (citadel) को विदेशी प्रभुत्व के वास्तुशिल्प (a architectural signs of alien domination) की संज्ञा दी थी।

§  व्हीलर ने एक पत्रिका Ancient India का प्रकाशन शुरू करवाया। व्हीलर ने राष्ट्रीय संग्रहालय (National Museum of India) के गठन हेतु मारिस गॉयर की अध्यक्षता में एक समिति का गठन करवाया था। उनके उत्तराधिकारी महानिदेशक एन.पी. चक्रवर्ती के काल में 15 अगस्त 1949 को राष्ट्रीय संग्रहालय की स्थापना कर दी गयी।

 

 

एन.पी. चक्रवर्ती (1948) तथा  माधोस्वरुप वत्स (1950)

§  1948 में एन.पी. चक्रवर्ती तथा 1950 में माधोस्वरुप वत्स महानिदेशक बने।

§  1951 में संसद ने प्राचीन और ऐतिहासिक स्मारक तथा पुरास्थल एवं ध्वंसावशेष अधिनियम पारित किया।

§  1958 में इस अधिनियम को और व्यापक करते हुए प्राचीन स्मारक तथा ध्वंसावशेष अधिनियम (पुरातात्विक पुरास्थल एवं अवशेष) पारित एवं लागू किया गया।

अमलानन्द घोष (1953) तथा ब्रजबासी लाल (1968)

§  1953 में अमलानन्द घोष तथा 1968 में ब्रजबासी लाल महानिदेशक बने। अमलानन्द घोष के ही कार्यकाल में 1957 में 'गाँव-गाँव सर्वेक्षण' की महत्त्वाकांक्षी परियोजना बनायी गयी।

बी.बी. लाल

§  बी.बी. लाल को भारत का हेनरिख श्लीमॅन कहा जा सकता है क्योंकि उन्होंने भी श्लीमॅन की तरह महाकाव्यों (इलियड) में वर्णित शहरों की खुदाई राष्ट्रीय योजना के आधार पर करनी शुरू की थी।

§  साहित्यिक साक्ष्यों के आधार पर पुरातात्त्विक खोज का प्रसिद्ध उदाहरण हेनरिख श्लीमॅन (1822-1890) द्वारा प्रारम्भ किया गया था। उन्होंने होमर के इलियड और ओडिसी महाकाव्यों में वर्णित प्राचीन ट्राय नगर की खोज की थी।

§  बी.बी. लाल ने रामायण और महाभारत युगीन स्थलों-हस्तिनापुर, अहिछत्र, नन्दीग्राम, भारद्वाज आश्रम, मथुरा, कुरुक्षेत्र, अयोध्या, श्रृंगवेरपुर आदि स्थलों की खुदाई प्रारम्भ की।

§  बी.बी. लाल के कार्यकाल में The Antiquities and Art fresure Act, 1972 पारित हुआ। पार्जिटर की तरह बी.बी. लाल ने भी महाभारत युद्ध की तिथि 950 ई. पू. निर्धारित की थी।

§  1967 में वाराणसी में इण्डियन आर्किॲलाजिकल सोसायटी की स्थापना हुई। 1976 में सोसायटी फार प्रिहिस्टारिक एण्ड क्वाटरनरी स्टडीज की स्थापना की गयी।

§  1979 में बी.बी. लाल ने अपना पद छोड़ दिया। 1981 में देबला मित्रा महानिदेशक बनीं।

 

प्रमुख महत्वपूर्ण तथ्य

§  पुरातात्विक उत्खननों में वैज्ञानिक विधियों को लाने का श्रेय व्हीलर को है। भारतीय पुरातात्विक उत्खननों में सर्वप्रथम ह्वीलर ने ही प्रथम वैज्ञानिक पुरातात्विक उत्खनन, स्तर-विन्यास (Stratification) एवं त्रिविमितीय नाप-जोख पद्धति का पालन किया था।

§  ए. ई. डगलस ने सर्वप्रथम वृक्षवलय तिथि प्रणाली विकसित की थी।

§  पुरातत्त्व में हवाई छायांकन विधि का संर्वप्रथम प्रयोग करने वाले ओ.जी.एस. क्रॉफोर्ड थे।

§  यूरेनियम डेंटिंग के जनक क्यूरी हैं। कार्बन डेंटिंग के जनक नोबल पुरस्कार विजेता विलर्ड लिवी है। लिवी ने 1949 में इस विधि का आविष्कार किया था।

§  एस.आर. राव को भारत में जलीय पुरातत्व का अग्रणी कहा जाता है। एस. कठिरोली का Water Archeology का अध्ययन भी उल्लेखनीय है। भारत में एस.आर. राव ने गुजरात में समुद्र की गहराइयों में एक स्थल की खोज की थी जिसे वे प्राचीन द्वारका मानते हैं।

§  कर्नल मीडोज टेलर को दक्षिण भारत की महापाषाणिक समाधियों (Megalithic Burials) का उत्खननकर्ता स्वीकार किया जाता है।

 

शाखा

अध्ययन

पैलीनोलॉजी

पराग एवं बीजाणुओं का अध्ययन।

 

आर्कियोमेट्री

 

पुरातात्विक सामग्रियों के विश्लेषण के लिए प्रयुक्त माप-पद्धति एवं वैज्ञानिक अनुप्रयोगों को पुरातत्त्वमिति कहते हैं।

पेलियॉन्टॉलोजी

 

प्राचीन जीवाश्मों का वैज्ञानिक अध्ययन।

 

एथनो-ऑकियोलाजी

 

नृजाति-पुरातत्व विज्ञान वर्तमान की संस्कृतियों एवं समुदायों का अध्ययन अतीत के समुदायों से जुड़े पुरातात्विक प्रभावों की व्याख्या करने के लिए करता है।

पैलियो-पैथोलाजी

 

कंकाल या हड्डियों के विश्लेषण के आधार पर प्राचीन बीमारियों एवं चोटों का अध्ययन।

कागनिटिभ (संज्ञानात्मक) आर्कियोलाजी

 

अतीत की भौतिक संस्कृति के विश्वासों एवं धर्म के बारे में सोचने या अनुमान के तरीकों से सम्बन्धित है।

औद्धारिक (rescue or salvage) पुरातत्त्व

 

महानिदेशक श्री जगपति जोशी के कार्यकाल में आंध्र प्रदेश में कुडवल्ली-संघमेश्वर के मंदिर को डूब क्षेत्र से हटाकर 22 किलोमीटर दूर पुनः स्थापित करना; इसे ही औद्धारिक पुरातत्त्व की संज्ञा दी जाती है।

पुरातात्विक स्रोत

    प्राचीन भारत के इतिहास के अध्ययन के लिये पुरातात्विक साक्ष्यों का अपना महत्त्व हैं। पुरातात्विक स्रोत कहीं-कहीं पर स्वतंत्र रूप से तो कहीं-कहीं साहित्यिक स्त्रोत के पूरक के रूप में अध्ययन को सरल बनाते हैं। खास कर ऐसे काल में जिसका साहित्यिक साक्ष्य अस्पष्ट और भ्रामक होता है। पुरातात्विक साक्ष्यों में अभिलेख, सिक्के, स्मारक तथा भवन, मूर्तियाँ, चित्रकला, एवं अन्य अवशेषों को रखा जा सकता है।

        मानव इतिहास के अधिकांश भाग के अध्ययन के लिये हम पुरातात्विक साक्ष्य पर ही निर्भर हैं।

        साहित्यिक साक्ष्य के विपरीत पुरातात्विक साक्ष्य अपने स्वरूप में अधिक वस्तुनिष्ठ होता है।

        प्राचीन काल का साहित्य अधिकतर कुलीन एवं अभिजात्यों पर केंद्रित हैं किंतु पुरातत्व उच्च एवं निम्न वर्ग के बीच कोई विभेद नहीं करता।

पुरातात्विक साक्ष्य की सीमायें-

        भले ही पुरातात्विक सामग्रियां अपने स्वरूप में वस्तुनिष्ठ हों किंतु उनके आधार पर लिया गाया निष्कर्ष व्यक्तिनिष्ठ ही होता है। Post Processual School ने भी इस ओर संकेत किया है।

        पुरातात्विक सामग्रियों में भी मानवीय हस्तक्षेप की गुजाइश होती है, उदाहरण के लिए अशोक के कई अभिलेख अपने मूल स्थान से हटा दिये गये हैं। उसी प्रकार, हड़प्पा नामक स्थल पर कई भवनों का आकार बदल गया क्योंकि वहां से कई ईंटे चोरी हो गयीं।

        हम जिन पुरातात्विक सामग्रियों को महत्वपूर्ण समझकर उनका अध्ययन विश्लेषण करते हैं तो उनमें से सामग्रियों का एक बड़ा भाग ऐसा होता है जो आदिमानव के द्वारा परित्याग कर दिया गया होता है।

 

पुरातात्विक अध्ययन के नये आयाम

फील्ड आर्कियोलॉजीः पुरातात्विक स्थलों के अन्वेषण तथा उनकी खुदाई को हम Field Archaclogy के नाम से जानते हैं।

मेरिन आर्कियोलॉजीः- सामान्यतः पुरातात्विक उत्खनन भूमि क्षेत्र में किया जाता है किंतु कई बार सामुद्रिक क्षेत्र में भी उत्खनन करने की जरूरत होती है। किंतु अगर हम अन्य देशों के सामुद्रिक पुरातत्व पर दृष्टिपात करते हैं तो फिर हमें यह ज्ञात होता है कि वह दुर्घनाग्रस्त जहाजों के अन्वेषण तक ही सीमित होता है किंतु भारत में उसका दायरा बहुत ही विस्तृत है। भारत में जल में विलीन हुए शहरों का भी अन्वेषण किया जाता है उदाहरण के लिये गुजरात में द्वारका तथा बेट द्वारका में समुद्रतल के नीचे नगरों के अवशेष मिले हैं।

कार्बन डेटिंग और यूरेनीयम डेटिंग - जीवाश्म के काल निर्धारण में कार्बन-डेटिंग पद्धति तथा गैर जीवाश्म के काल निर्धारण में यूरेनियम डेटिंग पद्धति का उपयोग किया जाता है

अर्कियोमेट्री - इसके तहत् प्राचीन सामग्री के अध्ययन एवं विश्लेषण के लिए उसके आकार को भी मापा जाता है तथा उसके रासायनिक परीक्षण पर भी बल दिया जाता है।

पैलियोन्टोलॉजी- आदि मानव के जीवाश्म के अध्ययन हेतु मॉलीक्यूलर बायोलॉजी (malicular Biology ) तथा DNA का अध्ययन किया जाता है। हाल में  y-chromosome के अध्ययन के बाद लगभग यह सिद्ध किया जाने लगा है कि वैदिक आर्य बाहर से ही आए थे।

पर्यावरणीय पुरातत्व- इसके तहत् पुरातत्व का अध्ययन किसी क्षेत्र विशेष में पर्यावरण के क्षेत्र में। होने वाले बदलाव के सन्दर्भ में किया जाता है।

एथिनो आर्कियोलॉजी (Ethno Archaelogy) - इसके तहत अतीत के समुदायों के जीवन से जुड़ी हुयी जानकारी प्राप्त करने के लिए वर्तमान समुदायों के व्यवहार एवं गतिविधियों का अध्ययन किया जाता है

सैल्वेज आर्कियोलॉजी (Salvage Archeaelogy) - ग्रामीण से नागरीय क्षेत्र के विस्तार के कारण कई पुरातात्विक स्थल विनष्ट होने के कगार पर आ गए है इसलिए इसका उद्‌देश्य खतरों से ग्रस्त स्थलों की पहचान कर उन्हें सुरक्षित बनाना l

रेडियो कार्बन या कार्बन 14 (C14)

उत्खनन और अन्वेषण के फलस्वरूप प्राप्त भौतिक अवशेषों का विभिन्न प्रकार से वैज्ञानिक परीक्षण किया जाता है। रेडियो कार्बन काल निर्धारण की विधि से यह पता लगाया जाता है कि वे किस काल के हैं। रेडियो कार्बन या कार्बन 14 (C14) कार्बन का रेडियोधर्मी समस्थानिक (आइसोटोप) है जो सभी प्राणवान वस्तुओं में विद्यमान होता है। सभी रेडियोधर्मी पदार्थों की तरह इसका निश्चित/ समान गति से क्षय होता है। जब कोई वस्तु जीवित रहती है तो C14 के क्षय की प्रक्रिया के साथ हवा और भोजन की खुराक से उस वस्तु में C14 का समन्वय भी होता रहता है। परंतु जब वस्तु निष्प्राण हो जाती है तब इसमें विद्यमान C14 के क्षय की प्रक्रिया समान गति से जारी रहती है लेकिन यह हवा और भोजन से C14 लेना बंद कर देती है। किसी प्राचीन वस्तु में विद्यमान C14 में आई कमी को माप कर उसके समय का निर्धारण किया जा सकता है। यह इसलिए संभव है क्योंकि C14 का क्षय निश्चित गति से होता है, जैसा पहले बताया जा चुका है। यह ज्ञात है कि कि आधा जीवन 5568 वर्षों का होता है। रेडियोधर्मी पदार्थ का आधा जीवन वह काल/ समय होता है जिसमें उस वस्तु की आधी रेडियोधर्मी धारिता लुप्त हो जाती है। इस प्रकार अगर कोई वस्तु 5568 वर्षों पहले निष्प्राण हो गई तो उसकी C14 धारिता उस समय की तुलना में आधी रह जाएगी जब वह जीवित थी और अगर वह 11,136 वर्ष पहले निष्प्राण हुई तो उसके C14 की धारिता उस समय की तुलना में चौथाई रह जाएगी जब वह जीवित थी।