इतिहास

अंग्रेजी शब्द 'हिस्ट्री' ग्रीक शब्द 'हिस्टोरिया' (अनुसंधान) से लिया गया है। सर्वप्रथम अथर्ववेद में इतिहास शब्द का उल्लेख मिलता है। 'इतिहास' अथर्ववेद का उपवेद है। हेलीकारनासस में जन्मे हेरोडोटस (484-430 ई.पू.) 'काल' के परिप्रेक्ष्य में मनुष्य को देखने वाले पहले व्यक्ति थे। उन्हें 'इतिहास का जनक' तथा 'पर्सियन युद्धों का होमर' भी कहा जाता है।

·       इतिहास शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख अथर्ववेद में मिलता है।

  • ई.एच. कार (E.H. Carr) के अनुसार- 'इतिहास, अतीत एवं वर्तमान के बीच होने वाला अनवरत/अन्तहीन संवाद है। व्हाट इज हिस्ट्री ? (What Is History?) पुस्तक के लेखक ई.एच. कार (E.H. Carr) हैं'
  • ई.एच. कार (E.H. Carr) के अनुसार- 'इतिहास, इतिहासकार और उसके तथ्यों के बीच चलने वाला अन्तहीन संवाद है।'
  • जे.बी. ब्यूरी (J.B. Bury) के अनुसार 'इतिहास विज्ञान है, न कम, न अधिक।'
  • बेनेडिटो क्रोचे (Benedetto Croce) के अनुसार- 'समस्त इतिहास समसामयिक इतिहास है।'
  • आर.जी. कॉलिंगवुड (R.G. Collingwood) के अनुसार- 'सम्पूर्ण इतिहास विचारों का इतिहास है।'
  • जी.आर. एल्टन के (G.R. Elton) अनुसार 'इतिहासकार जिसे. लिखता है वही इतिहास है।'
  • फ्रांसिस बेकन (Francis Bacon) के अनुसार- 'इतिहास हमें बुद्धिमान बनाता है।'
  • बरनी ने इतिहास को विज्ञानों की रानी कहा था।
  • अबुल फजल के अनुसार "इतिहास एक चिकित्सालय है जहाँ व्यक्ति अपने दुःखों की दवा पाता है और उदासी का इलाज कराता है।"

भारत का नामकरण

Ø  जम्बूद्वीप, इंडिया, हिंदुस्तान एवं इन-तु हमारे देश के विविध नाम हैं। विदेशी सर्वप्रथम सिन्धु तटवासियों के सम्पर्क में आये, इसलिए उन्होंने पूरे देश को ही सिन्धु या इण्डस नाम से पुकारा। भारतीय उपमहाद्वीप वास्तविक रूप से त्रिकोणाकार या धनुषाकृति आकार का था। वाराहमिहिर की वृहतसंहिता में इसे 'कूर्म की आकृति', पुराणों में धनुआकृति, दीघनिकाय में छकड़े की भाँति तथा महाभारत में समभुजाकार त्रिभुज की भाँति बताया गया है।

Ø  भारतवर्ष' अर्थात् भरतों का देश। भरत नामक एक प्राचीन राजवंश के नाम पर इस देश को भारतवर्ष कहा गया। जिस भरत वंश के नाम से हमारे देश का नाम भारत पड़ा उनका राज्य सरस्वती तथा यमुना नदियों के बीच के प्रदेश में स्थित था।

Ø  जैन धर्म के अनुसार, उनके प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के पुत्र सम्राट 'भरत' के नाम पर देश का नाम भारत पड़ा।

Ø  भरत, भारत के पहले 'चक्रवर्ती सम्राट' थे। चक्रवर्ती सम्राट की परिभाषा कौटिल्य के अर्थशास्व में मिलती है। कौटिल्य के अनुसार, "हिमालय से लेकर समुद्र तक हजार योजन विस्तार वाला भाग चक्रवर्ती राजा का शासन क्षेत्र होता है।

Ø  यूनानियों ने इस देश को India कहकर पुकारा। सर्वप्रथम 'इंडिया' नाम का प्रयोग छठीं-पाँचवीं शताब्दी ई.पू. में हेरोडोटस ने किया था। तदुपरान्त इंडिया शब्द का प्रयोग मेगस्थनीज ने किया। महत्वपूर्ण है कि 'हेरोडोटस' द्वारा वर्णित 'इंडिया' से केवल सिन्धु तथा उसके डेल्टा क्षेत्र का ही बोध होता है, जबकि मेगस्थनीज द्वारा वर्णित इंडिया से सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप का बोध होता है।

Ø  पुराणों तथा अशोक के अभिलेखों में हमारे देश का नाम जम्बूद्वीप मिलता है। वस्तुतः जम्बू नामक वृक्ष मिलने के कारण इस देश का नाम जम्बूद्वीप पड़ा। पुराणों में पृथ्वी के सात द्वीप बताये गये हैं जिसमें एक जम्बूद्वीप भी था।

Ø  चीनियों ने भारत को यिन-तू (Yin-tu) कहा। सर्वप्रथम झांगकियान या चांकियेन ने शेन-दु शब्द का प्रयोग किया था जोकि वास्तव में सिन्धु नदी का चीनी रूप है। ह्वेनसांग ने भारत को यिन-तू (चन्द्रमा) कहकर सम्बोधित किया था। इत्सिंग ने भारत को आर्य देश एवं ब्रह्म राष्ट्र कहकर पुकारा।

Ø  खारवेल के हाथी गुम्फा अभिलेख में सर्वप्रथम 'प्राकृत' में भरधवस (भारतवर्ष) का विवरण मिलता है।

Ø  जब आर्य भारत आये तो इसका नाम सप्तसैंधव पड़ा। सरस्वती, शतुदी, विपाशा, परुष्णी, अस्किनी, वितस्ता और सिन्धु-इन सात नदियों द्वारा सिंचित प्रदेश को ही सप्तसैंधव कहा गया है। इसमें पंजाब, सिंध एवं अफगानिस्तान के क्षेत्र सम्मिलित थे। यही आर्यों का पहला निवास स्थान बना और यहीं पर ऋग्वेद के वंश-मण्डल की रचना हुई थी।

वृहत्तर-भारत (Greater India)

सर्वप्रथम मत्स्य पुराण में वृहत्तर-भारत की अवधारणा मिलती है जिसमें भारतवर्ष के साथ दक्षिण पूर्व एशिया (सुवर्णद्वीप या सुवर्णभूमि) के आठ अन्य द्वीपों को सम्मिलित किया जाता है। इसमें ताम्रपर्णी (श्रीलंका), कम्बोडिया या फू-नान या कम्बुज, सुमात्रा, जावा या यवद्वीप, चम्पा या अन्नाम, बोर्नियों या वरुणद्वीप, बाली और स्याम या थाईलैण्ड सम्मिलित थे। समुद्र पार के भारतीय प्रदेशों को 'द्वीपान्तर' कहा जाता था। 'अरब भूगोलशास्त्री' मसूदी ने 943 ई. में लिखित अपनी पुस्तक सोने की चरागाहें (Meadows of the Gold) में कहा है कि "भारत, भूमि और समुद्र दोनों पर ही फैला हुआ था और उसकी सीमा जबाग (सुमात्रा या वृहत्तर जावा या शैलेन्द्र साम्राज्य) तकं विस्तृत थी।"

हिन्दुस्तान

सर्वप्रथम 262 ई. (तीसरी सदी) में ईरान के सासानी शासक शाहपुर प्रथम के नक्श-ए-रुस्तम अभिलेख' में इस देश का नाम हिन्दुस्तान' मिलता है। यह लेख तीन भाषाओं (ईरानी, पहलवी तथा ग्रीक या यूनानी) में रचित है। महत्वपूर्ण है कि इस समय भी हिंदुस्तान नाम सिन्धु तथा उसके डेल्टा के लिए ही था। सर्वप्रथम 9वीं/ 10वीं शताब्दी में किसी अज्ञात लेखक द्वारा रचित फारसी ग्रंथ हुडूड-अल-आलम में हिंदुस्तान शब्द से पूरे उपमहाद्वीप को वर्णित किया गया है। अमीर खुसरो भारत को हिन्द तो इसामी ने हिन्दुस्तान कहकर सम्बोधित किया है। अमीर खुसरो ने अपने ग्रन्थ 'नूह सिपहर' में भारत को पृथ्वी का स्वर्ग कहा है। खुसरो के अनुसार "हिन्द ने दुनियां को गिनती, पंचतंत्र तथा शतरंज का ज्ञान दिया है।"

इतिहास का अध्ययन

प्रागैतिहासिक कालः- वह काल जिसका कोई लिखित साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। अतः इस काल का इतिहास पूर्णतः उत्खनन में मिले पुरातात्विक साक्ष्यों पर निर्भर है। पाषाण काल को प्रागैतिहासिक काल में रखा जाता है।

आद्य ऐतिहासिक कालः इस काल की लिखित लिपि तो है पर या तो उसे पढ़ने में सफलता नहीं मिली है या उसकी प्रामाणिकता संदिग्ध है। हड़प्पा और वैदिक संस्कृति की गणना आद्य ऐतिहासिक काल में की जाती है।

ऐतिहासिक कालः इस काल का इतिहास लिखित साधनों पर निर्भर करता है। इसके पुरातात्विक एवं साहित्यिक विवरण उपलब्ध है तथा लिपि पढ़ने में सफलता भी मिली है। ईसा पूर्व छठी शताब्दी से ऐतिहासिक काल प्रारम्भ होता है।

भौतिक-अवशेष
      प्राचीन भारत के निवासियों ने अपने पीछे अनगिनत भौतिक अवशेष छोड़े हैं। दक्षिण भारत में पत्थर के मंदिर और पूर्वी भारत में ईंटों के विहार आज भी धरातल पर देखने को मिलते हैं, और उस युग का स्मरण कराते हैं जब देश में भारी संख्या में भवनों का निर्माण हुआ। परंतु इन भवनों के अधिकांश अवशेष सारे देश में बिखरे अनेकानेक टीलों के नीचे दबे हुए हैं। टीला धरती की सतह के उस उभरे हुए भाग को कहते हैं जिसके नीचे पुरानी बस्तियों के अवशेष रहते हैं। यह कई प्रकार का हो सकता है:-

1. एकल-संस्कृतिक,

2. मुख्य-संस्कृतिक

3. बहु-संस्कृतिक।

एकल-सांस्कृतिक- एकल-संस्कृतिके टीलों में सर्वत्र एक ही संस्कृति दिखाई देती है। कुछ टीले केवल चित्रित धूसर मृद्भांड अर्थात् पेंटेड ग्रे वेअर (पी० जी० डब्ल्यू०) संस्कृति के द्योतक हैं, कुछ सातवाहन संस्कृति के, और कुछ कुषाण संस्कृति के।     

मुख्य-सांस्कृतिक- मुख्य-संस्कृतिक टीलों में एक संस्कृति की प्रधानता रहती है और अन्य संस्कृतियाँ जो पूर्वकाल की भी हो सकती हैं और उत्तर काल की भी, विशेष महत्त्व की नहीं होतीं।

बहु-सांस्कृतिक- बहु-संस्कृतिक टीलों में उत्तरोत्तर अनेक संस्कृतियाँ पाई जाती हैं जो कभी-कभी एक दूसरे के साथ-साथ चलती हैं।

टीले की खुदाई दो तरह से की जा सकती है - अनुलंब या क्षैतिज ।

अनुलंब-

        किसी सीमित क्षेत्र में गहराई तक उत्खनन

        स्थल की विभिन्न संस्कृतियों अथवा अवस्थाओं का समुचित अनुक्रम ज्ञात होता है

        स्थल का संस्कृति-मान या समय-मान (Time-Scale) तैयार किया जा सकता है।

        किसी प्रागैतिहासिक पुरास्थल के क्षेत्र में किस संस्कृति के लोग कब आये, उनकी संस्कृति का अन्त कब हुआ।  

        विभिन्न संस्कृतियों का पूर्वापर-क्रम, पारस्परिक सम्बन्ध तथा सापेक्ष समय का अनुमान लगाया जा सकता है।

        उत्खनन से अपेक्षाकृत एक सीमित क्षेत्र में खुदाई होने के कारण किसी पुरास्थल अथवा संस्कृति की विस्तृत जानकारी नहीं हो पाती है l

क्षैतिज

        किसी संस्कृति का सर्वांगीण परिचय प्राप्त करने के लिए जब किसी पुरास्थल के काल-विशेष से सम्बद्ध अथवा अधिकांश निक्षेप का उत्खनन किया जाता हैl

        सारे टीले की या उसके बृहत भाग की खुदाई।

        इस तरह की खुदाई से हम उस स्थल की काल विशेष की संस्कृति का पूर्ण आभास पा सकते हैं।

पुरातत्त्व (आर्किऑलजि) - जिस विज्ञान के आधार पर पुराने टीलों का क्रमिक स्तरों में विधिवत उत्खनन किया जाता है और प्राचीन काल के लोगों के भौतिक जीवन के बारे में जानकारी मिलती है, उसे पुरातत्त्व कहते हैं।

मुद्राशास्त्र (न्यूमिस्मेटिक्स)- सिक्कों के अध्ययन को मुद्राशास्त्र (न्यूमिस्मेटिक्स) कहते हैं

पुरालेखशास्त्र (एपिग्रेफी) :-अभिलेखो के अध्ययन को पुरालेखशास्त्र (एपिग्रेफी) कहते हैं, और इनकी तथा दूसरे पुराने दस्तावेज़ों की प्राचीन तिथि के अध्ययन को पुरालिपिशास्त्र (पेलिअॅग्रेफी) कहते हैं।

 

 


 

 

 

 पुरातात्विक अन्वेषण की विधियाँ

    हाल के दशकों में पुरातात्विक अन्वेषण ने नये आयाम ग्रहण किए हैं। एक समय था कि प्राचीन समुदाय के अध्ययन में हमारी पूरी निर्भरतो साहित्यिक साक्ष्य पर ही थी किन्तु पुरातात्विक अन्वेषण की नवीन तकनीक के विकास के साथ आज न केवल साहित्यिक साक्ष्यों द्वारा प्रदत सूचनाओं को परिपुष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है वरन् विभिन्न विषयों पर एक वैकल्पिक दृष्टिकोण भी ढूढ़ने का प्रयत्न किया जा रहा है। पुरास्थलों की खोज को प्रायः पुरास्थल-अन्वेषण अथवा पुरास्थल-सर्वेक्षण या क्षेत्रीय-सर्वेक्षण कहा जाता है। अंग्रेज पुरातत्वविद इसे व्यावहारिक पुरातत्व' या फील्ड-आर्किऑलॉजी' कहना पसन्द करते हैं। फील्ड-ऑर्किऑलॉजी शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग विलियम फ्रीमैन ने उन प्राकृतिक विज्ञानियों के लिये किया था जो वनस्पतियों एवं जीवित प्राणियों का अध्ययन उद्यानों एवं संग्रहालयों में नहीं बल्कि प्राकृतिक परिवेश में करते थे। पुरास्थलों को खोजने की विधियों को प्रमुख दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है:

1. परम्परागत पुरातात्त्विक पद्धति
2. वैज्ञानिक पद्धति।

परम्परागत पुरातात्त्विक पद्धति
1. आकस्मिक खोज (Chance Discoveries)
2. तल-चिह्न संकेत (Surface Indications)
3. साहित्यिक विवरण (Literary Accounts)
आकस्मिक खोज:-  मानव के क्रिया-कलापों के परिणामस्वरूप अथवा प्राकृतिक कारणों से जब किसी पुरास्थल के विषय में अनायास ही जानकारी हो जाती है तो इसको आकस्मिक खोज की संज्ञा दी जाती है। अनेक महत्वपूर्ण एवं प्रसिद्ध पुरास्थल इसी प्रकार से प्रकाश में आये हैं। भारत के पुरातत्त्व में बहुचर्चित 'ताम्रनिधियाँ' (Copper Hoards) आकस्मिक ढंग से ही समय-समय पर प्रकाश में आती रही हैंl

तलचिह्न संकेतो:- मानव के आवास एवं अन्य क्रिया-कलापों के संकेत-चिह्न पुरास्थलों की ऊपरी सतह पर कभी-कभी बिखरे हुए मिल जाते हैं। प्रागैतिहासिक पुरापाषाणिक स्थलों पर मानव निर्मित एवं प्रयुक्त पाषाण के औजार एवं उपकरण विकीर्ण मिलते हैं। यदा-कदा ऐसे उपकरणों के साथ जानवरों की अस्थियाँ भी उपलब्ध हो जाती हैं। 

साहित्यिक विवरण:- किसी देश के प्राचीन वाङ्‌मय के उपलब्ध साहित्यिक साक्ष्यों एवं यात्रियों के यात्रा-वृत्तान्तों आदि के आधार पर ऐतिहासिक काल के पुरास्थलों की खोज की जा सकती है। इन साक्ष्यों की विश्वसनीयता की जाँच-पड़ताल पुरातत्त्ववेत्ता वर्णित स्थानों पर जाकर स्वयं कर सकते हैं।

 

वैज्ञानिक पद्धति

   पुरास्थलों को खोजने के लिए परम्परागत पद्धति के अतिरिक्त वैज्ञानिक पद्धति का भी सहारा लिया जाता है। विज्ञान की बहुमुखी प्रगति के फलस्वरूप पुरास्थलों के खोज की अनेक विधियों का विकास संभव हुआ है। वैज्ञानिक विधियाँ अधिक सटीक एवं उपयुक्त हैं, लेकिन ये विधियाँ प्रायः व्ययसाध्य हैं और इनका प्रयोग भी सर्वत्र नहीं हो सकता है। प्रमुख वैज्ञानिक विधियों में हवाई छायांकन, भू-परीक्षण, चुम्बकीय-परीक्षण, मृदा-विश्लेषण एवं समुद्रतल की पुरातात्त्विक खोज का उल्लेख किया जा सकता है।

हवाई छायांकन - पुरास्थलों को खोजने का हवाई छायांकन एक महत्वपूर्ण माध्यम है। हवाई छायांकन की पद्धति का विकास क्रमशः हुआ। हवाई छायांकन से प्राप्त जानकारी के आधार पर किसी क्षेत्र अथवा स्थल का पुरातात्विक सर्वेक्षण अधिक सफलता एवं सूक्ष्मता के साथ किया जा सकता है। समतल एवं चौरस पुरातात्त्विक स्थल जो सामान्यतः दृष्टिगोचर नहीं होते हैं, उनका हवाई छायांकन के द्वारा ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। सेटेलाइट के माध्यम से प्राप्त चित्रों के द्वारा पुरातात्विक  अनुसंधान कार्य और अधिक आसान हो सकता है। इस प्रकार हवाई छायांकन तथा सेटेलाइट छायांकन पुरास्थलों को खोजने के अत्यन्त महत्वपूर्ण माध्यम सिद्ध हो रहे हैं।

भू-परीक्षण:- सर्वेक्षण के माध्यम से ज्ञात पुरास्थलों के विशिष्ट स्थान को ढूँढने की प्रमुख विधियों में भू-परीक्षण की विधि का उल्लेख किया जा सकता है। भू-परीक्षण की कई विधियाँ हैं। लौह-शलाका प्रवेश एवं ध्वनि परीक्षण सबसे आसान एवं कम खर्चीली विधियाँ हैं। धातु अभिज्ञापक, विद्युत प्रतिरोधमापक तथा चुम्बकीय परीक्षण आदि बहुत जटिल एवं व्ययसाध्य विधियाँ हैं जिनका सर्वत्र एवं सभी व्यक्यिों द्वारा प्रयोग सम्भव नहीं है।

इलेक्ट्रॉनिक विधियाँ - पुरातात्त्विक दृष्टि से इलैक्ट्रॉनिक विधियों द्वारा भू-परीक्षण किया जाता है लेकिन इन विधियों में सबसे बड़ी बाधा यह है कि ये विधियाँ व्ययसाध्य हैं। दूसरी कठिनाई यह है कि इलेक्ट्रॉनिक यंत्र सर्वत्र उलब्ध नहीं है। इनके अलावा इनके परिचालन में पर्याप्त अभ्यास एवं बहुत अधिक सावधानी रखने की आवश्यकता होती है। साधारण कोटि के पुरास्थल-सर्वेक्षणों में इलैक्ट्रॉनिक यंत्रों को ले जाना संभव नहीं है।

मृदा विश्लेषण - किसी स्थल की मिट्टी के रासायनिक विश्लेषण द्वारा भी पुरास्थलों की खोज की जा सकती है। मानव के आवास के परिणामस्वरूप किसी स्थान की मिट्टी में प्राकृतिक रूप से विद्यमान फॉस्फोरस, नाइट्रोजन, एवं कैल्शियम की मात्रा में वृद्धि हो जाती है। इन तत्वों की मात्रा का विश्लेषण करके पुरास्थल के अस्तित्व के विषय में जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

सागरतल का सर्वेक्षण - भूमध्यसागर में यूनान एवं इटली के तटों के पास समुद्र में डूबे हुए प्राचीन जहाजों तथा उनमें लदी हुई पुरानिधियों को खोज निकालने में पुरातत्वेत्ताओं को आशातीत सफलता प्राप्त हुई। बेथिस्केपलस (Bathyscaples) नामक यंत्र की सहायता से इस प्रकार का कार्य आसानी से सम्पन्न किया जा सकता है।

इतिहास अध्ययन के स्रोत—

प्राथमिक —

        प्राथमिक स्रोत उस लिखित प्रमाण अथवा भौतिक पदार्थ को कहा जाता है जिसकी रचना अथवा निर्माण उस काल में हुआ है, जिस काल का अध्ययन किया जा रहा है।

        ये प्रमाण उसी काल से संबंद्ध होते हैं तथा उस काल की किसी विशिष्ट घटना की आन्तरिक सच्चाई को प्रकट करते हैं।

        मौलिक दस्तावेज, राजकीय रिकार्ड, पांडुलिपि, पत्र, जीवनी लेखन, रचनात्मक लेखन कविता, नाटक, संगीत, कला, अवशेष एवं कलाकृतियाँ- मृदभांड, फर्नीचर, कपड़े, भवन आदि l

द्वितीयक -

        द्वितीयक स्रोत प्राथमिक स्त्रोत की व्याख्या और विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं।

        द्वितीयक स्त्रोत में प्राथमिक स्त्रोत के चित्र अथवा उद्धरण हो सकते हैं

        द्वितीयक स्त्रोत प्राथमिक स्त्रोत का संपादित एवं परिवर्त्तित संस्करण होता है।

        द्वितीयक स्त्रोत में पुस्तक, आलोचना, टीकाएँ आदि शामिल होती हैं।

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